धर्म के सम्बन्धी में Gandhiji Ke Vichar || गांधी जी की धार्मिक आस्था

आपका गवर्नमेंट सरकारी योजना (govtsarkariyojna) वेबसाइट में स्वागत है। इस आर्टिकल के माध्यम से हम जानेंगे कि महात्मा गांधी जी के धार्मिक विचार, Gandhiji Ke Vichar क्या है? किस आस्था से लेते थे धर्म को, क्या धर्म के बारे में कहते हैं? चलिए इस आर्टिकल को पढ़ते हैं और जानते हैं गांधीजी के विचार धार्मिक आस्था के बारे (gandhi ji ke dharmik vichar) में तो चले शुरू करें।

Gandhi Ji Ke Vichar स्रोत
Gandhi Ji Ke Vichar स्रोत

Gandhi Ji Ke धर्म के सम्बन्धी में विचार

धर्म, संसार की नैतिक अनुशासन की व्यवस्था है। धर्म, व्यक्ति के जीवन और समाज का आधारभूत तत्व है। गांधी जी के धर्म सम्बन्धी विचार (Gandhi Ji Ke Dharmik Vichar) संकुचित नहीं थे। सामान्यतः धर्म का अर्थ उपासना, पूजा-पाठ के साथ जोड़कर देखा जाता है। इसी प्रकार धर्म को किसी सम्प्रदाय के साथ जोड़ना आम बात है। पर गांधी जी के लिए धर्म का यह रूढ़िगत अर्थ नहीं है। यह तो धर्म को विकृत करके देखना या समझना है।

Gandhi Ji के लिए धर्म, मानव समाज का शाश्वत तत्व है, जो सीमित और संकुचित भावनाओं और विचारों से परे है। गांधी जी का धर्म मानवतावादी है, वह आक्रामक या सीमित नहीं है अपितु धर्म सर्वहित के लिए सभी के मंगल शुभ के विचार को लेकर चलने वाला है।

यह हिन्दुत्व या इस्लामियत से परे है। गांधी जी की (Gandhi Ji Ke) आस्था हिन्दू धर्म में गहरी थी। इसका कारण यह है कि हिन्दू धर्म व्यापकता और सर्वधर्म समन्वय की दृष्टि वाला है। हिन्दू धर्म सब धर्मों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से रहने में विश्वास करता है।

गांधी जी की धार्मिक आस्था (Gandhi ji ke dharmik Aastha)

Gandhi ji की धार्मिक आस्था में ऊँच-नीच, जाति भेद, पंथ-भेद को कोई स्थान नहीं था। जो धर्म मनुष्य-मनुष्य में अन्तर करता है, गांधी जी उसे धर्म नहीं मानते। उनकी आस्था हिन्दू धर्म में अटूट थी पर वे छुआछूत में विश्वास नहीं करते थे। वे छुआ-छूत को धर्म का तत्व नहीं मानते थे। उनका विचार था कि ईश्वर ने मनुष्य को ऊँच-नीच के साथ पैदा नहीं किया है, वे अस्पृश्यता में विश्वास को भगवान का निषेध मानते थे।

सभी ईश्वर का अंश हैं फिर छुआछूत का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। जो सामाजिक दृष्टि से गिरे हुए हैं और हम जिन्हें अस्पृश्य कहते हैं, उनकी सेवा करना सच्चा धर्म है। गांधी जी ने दरिद्रों में ईश्वर का वास देखा। वे दरिद्र नारायण की सेवा, ईश्वर सेवा मानते थे। गांधी जी धार्मिक थे, पर अंधविश्वासी नहीं। उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त बुराइयों और अंधविश्वासों को समाप्त करने का कार्य किया। विश्व के सभी धर्मों की मूल शिक्षाएँ एक-सी हैं।

सभी सत्य, सद्आचरण, प्रेम, मानव सेवा, अहिंसा और सद्भाव पर विश्वास करते हैं, अतः सभी धर्मों के द्वार मानव के लिए खुले रहने चाहिए। गांधी जी धर्म परिवर्तन (Dharm Parbartan) ) के समर्थक नहीं थे। उनके आश्रम में सभी धर्मों के अनुयायी रहते थे, पर उन्होंने किसी का भी धर्म परिवर्तन नहीं किया और न किसी को धर्म परिवर्तन की सलाह दी।

गांधी जी का विश्वास (Gandhi ji ka Vishwas)

धर्म के साथ एक बात और जुड़ी है। प्रायः धार्मिक व्यक्ति आराधना के लिए किसी एकान्त और निरापद स्थान को खोजता है। पर्वत शिखरों पर या गुफाओं में बैठकर आराधना करता है। गांधी जी का विचार (Gandhiji Ke Vichar) था कि वस्तुतः धर्म की अभिव्यक्ति तो समाज में रहते हुए हमारे कार्यों में होनी चाहिए।

गरीब, असहाय, पीड़ित लोगों की सेवा सच्ची साधना है। गांधी जी का विश्वास प्रार्थना में था। वे प्रार्थना की शक्ति में विश्वास करते थे। प्रार्थना से हमारे मन को शांति और शक्ति दोनों मिलती है। प्रार्थना गांधी जी के जीवन की दैनिक दिनचर्या का अंग थी।

धर्म और राजनीति (Dharm aur Rajniti)

गांधी जी के लिए धर्म और राजनीति अलग-अलग नहीं हैं। धर्म के व्यापक स्वरूप को स्वीकार करने के बाद यह सम्भव नहीं है कि हम राजनीति को अलग कर दें। धर्म, मानव जीवन की धुरी है। गांधी जी के अनुसार धर्म का विश्वास है कि विश्व व्यवस्थित रूप से सैनिक नियमों के अनुसार शासित हो रहा है।

राजनीति का धर्म से पृथक कोई अस्तित्व नहीं है। अगर राजनीति धर्म की मूल अवधारणा से पृथक है तो वह धोखा और पाखण्ड है। मैकियावली सहित आधुनिक युग के विचारक धर्म और राजनीति को अलग-अलग मानते हैं। मॉर्क्स के लिए तो धर्म एक अफीमी नशा है।

धर्म के वास्तविक स्वरूप (Dharam ka Swaroop)

कुछ लोगों के लिए धर्म, साधु-महात्माओं का, कुछ के लिए धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। गांधी जी का कहना है कि ऐसा वे ही कह सकते हैं जो धर्म के वास्तविक स्वरूप और अर्थ को नहीं मानते। गांधी जी के लिए धर्म और राजनीति के व्यापक लक्ष्य एक से थे। धर्म, व्यक्ति और समाज के कल्याण का साधन है।

इसी प्रकार राजनीति का लक्ष्य भी व्यक्ति और समाज के हितों में वृद्धि करना है। गीता की भावना के अनुसार यदि निष्काम भाव से हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहें तो विश्व कल्याण और जन कल्याण को प्राप्त किया जा सकता है। धर्म भावना हमें कर्मयोगी का जीवन व्यतीत करने को प्रेरित करती है। वह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि जब गांधी जी धर्म को (Gandhi ji Dharm ko) राजनीति का आधार बनाने की बात कहते हैं तो उनका अभिप्राय किसी पंथ या सम्प्रदाय को राजनीति का आधार बनाना नहीं अपितु मानव जाति के उच्चतम मूल्यों को आधार बनाना है। गांधी जी की मान्यता थी कि राजनीति को धर्म से पृथक नहीं किया जा सकता।

राजनीति में नैतिकता का समावेश अनिवार्य है। वे कहते थे कि मेरे लिए धर्मविहीन राजनीति कोई चीज नहीं है। नीति शून्य राजनीति सर्वथा त्याज्य है। उनका मानना था कि राजनीति, धर्म की अनुगामिनी है। धर्म से शून्य राजनीति मृत्यु का एक जाल है, क्योंकि उससे आत्मा का हनन होता है।

पंथ राजनीति के विरोधी (Gandhi ji ka Dharmik Vichar)

Gandhiji Ke Vichar धर्म और राजनीति को एक अवश्य किया पर वे धर्मतन्त्र या पंथ राजनीति के विरोधी थे। उन्होंने यह कहीं भी नहीं कहा कि राजसत्ता को धर्माचार्यों के हाथों सौंप दिया जाना चाहिए अथवा राज्य को किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष का विकास या प्रचार करना चाहिए।

गांधी जी ने जिस समाज व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का विचार प्रस्तुत किया है, उसमें राज्य का कोई विशेष धर्म नहीं है। पर ऐसा भी नहीं है कि राज्य पूर्णतः धर्म के मूल तत्वों से रहित हों। वस्तुतः राज्य को नीति Dharm के शाश्वत और सार्वभौतिक नियमों सत्य, अहिंसा, प्रेम आदि का पूर्ण पालन करना चाहिए। राजनीति में कार्य करने वाले व्यक्तियों को भी सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखना चाहिए। ईश्वर में विश्वास रखना चाहिए।

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