गांधी जी का राजनीति दर्शन और सत्याग्रह ।। Gandhi On Satyagraha

Gandhi On Satyagraha सत्याग्रह की शुरुआत कब और कैसे हुई? किन हालातों में गांधी जी ने सत्याग्रह की शुरुआत की, गांधी जी राजनीतिक दर्शन और सत्याग्रह पर क्या कहते हैं? गांधीजी के Satyagraha महत्त्वपूर्ण विचारों को इस आर्टिकल में सांझा किया जा रहा, आप पूरा पढ़े। satyagraha in hindi के बारे में जाने इस महान आर्टिकल को पूरा पढ़ें।

Gandhi On Satyagraha
Gandhi On Satyagraha

Gandhiji ke Rajnitik Vichar aur satyagrah

गांधी जी के राजनीतिक विचार, उनकी नैतिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित थे। गांधी जी राजनीति में नैतिक मूल्यों को समाविष्ट करने के समर्थक थे। उनके लिए राजनीति साध्य नहीं अपितु न्याय और सत्य के मूल्यों की स्थापना का साधन थी। राजनीति की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है अपितु वह व्यापक धार्मिक विचारों के अधीन है।

एक राजनीतिक विचारक (Gandhiji ke Rajnitik Vichar) के रूप में गांधी जी ने पाश्चात्य लोकतांत्रिक राजनीति की कटु आलोचना की। गांधी जी का मत था कि पाश्चात्य लोकतांत्रिक राजनीति के अन्तर्गत पूँजीवाद का प्रसार हुआ है। परिणामतः कमजोर और असहाय का शोषण होता है। उनका कहना था कि केवल अहिंसा द्वारा ही सच्चे लोकतंत्र की स्थापना की जा सकती है। वे शक्ति के विकेन्द्रीकरण के समर्थक थे। वे चाहते थे कि भारत विकसित होकर सच्चे लोकतंत्र का रूप धारण करें।

गांधी जी राज्य को हिंसा तथा शक्ति का संगठित रूप मानते थे। उन्होंने ऐसे आदर्श राज्य का विचार किया, जिसमें नैतिक शक्ति का प्रभुत्व होगा और हिंसा पर आधारित व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। इस आदर्श राज्य को उन्होंने रामराज्य कहा। वे अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख के स्थान पर “सर्वेपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामय” के समर्थक थे। उनकी आस्था सर्वोदय में थी। उनका विश्वास था कि यदि हम राजनीति में अहिंसा का अधिकाधिक प्रयोग करेंगे तो बाध्यकारी राज्य अपने आप समाप्त हो जाएगा।

सत्याग्रह पर गांधी जी (Gandhiji On Satyagraha)

Gandhiji ke राजनीतिक दर्शन में सत्याग्रह का विशेष महत्त्व है। गांधी जी ने राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए अनेक साधनों का उपयोग किया है। इन सभी साधनों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। पर इन सभी साधनों को सामूहिक रूप से ‘सत्याग्रह’ कहा जा सकता है। निष्क्रिय प्रतिरोध, असहयोग, सविनय अवज्ञा, उपवास, धरना आदि सत्याग्रह के ही रूप हैं, तथापि ‘Satyagraha‘ अहिंसक तिरोध से अधिक व्यापक है।

सत्याग्रह (Satyagraha meaning) का शाब्दिक अर्थ है, सत्य के लिए आग्रह अथवा सत्य, जिसमें अहिंसा और प्रेम भी सम्मिलित है, से उत्पन्न होने वाली शक्ति। इस रूप में सत्याग्रह, सत्य के लिए तपस्या है। कठोरतम और अत्यधिक विपरीत परिस्थितियों में भी अहिंसक रहते हुए तथा कष्ट सहते हुए सत्य का आग्रह करना सत्याग्रह है। इस व्यापक अर्थ में इसके अन्तर्गत सभी विधायक सुधारों तथा संवैधानिक कार्यों का समावेश हो जाता है।

गांधी जी के लिए सत्याग्रह का विचार (Gandhi On Satyagraha) भौतिक शक्ति से सर्वथा विपरीत आत्मा की शक्ति है। सत्याग्रह आध्यात्मिक आस्थाओं पर आधारित विचार है। आत्मशक्ति ही अहिंसा को जन्म देती है, अहिंसा द्वारा सत्य का आग्रह, सत्याग्रह है। इस प्रकार अहिंसा और सत्य के द्वारा सत्याग्रह जन्म लेता है। सभी प्रकार के शोषण, उत्पीड़न, अन्याय और हिंसा के विरोध में शुद्धतम आत्म शक्ति का प्रयोग सत्याग्रह है।

सत्याग्रह का प्रयोग (Gandhi JI use of satyagraha)

सत्याग्रह का प्रयोग (use of satyagraha) सरकार, व्यक्ति, सामाजिक अत्याचारियों आदि सभी के विरोध में किया जा सकता है। जिस प्रकार तिल्क कहते थे कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, उसी प्रकार गांधी जी भी कहते थे कि सत्याग्रह मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। सत्याग्रह के आधार गांधी जी के आध्यात्मिक विचारों में हैं।

Satyagraha अत्याचारियों के विरोध में किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत, रागद्वेष रखे बिना अपनी अन्तरात्मा की आवाज का अनुसरण करता है तथा सत्य के लिए संघर्ष करता है। इस संघर्ष में ऐसे कितने भी शारीरिक कष्ट उठाने पड़ें, वह उठाता है। यहाँ तक कि यदि उसकी मृत्यु भी हो जाए, तो वह उसे सहर्ष स्वीकार करता है। पर हिंसा या द्वेष का विचार अपने मन में नहीं लाता। सत्याग्रही मन, वचन और कर्म में एकरूपता स्थापित करता है।

Gandhi On Satyagraha में इन गुणों का होना आवश्यक है वह ईश्वर में विश्वास रखे, यश की कामना से दूर रहे, नेता की आज्ञा का पालन करे, निर्भीक तथा दृढ़संकल्पी हो, धैर्यवान और निष्ठावान हो तथा व्यक्तिगत जीवन में भी अहिंसक हो। यदि सत्याग्रही व्यक्तिगत जीवन में अहिंसावादी नहीं होगा तो वह सार्वजनिक जीवन में भी अहिंसावादी नहीं हो सकता। सत्याग्रही को कभी झूठ या छल का सहारा नहीं लेना चाहिए, धन का लोभ नहीं होना चाहिए।

सत्याग्रह में सत्याग्रही को नैतिक अनुशासन और कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है, satyagrahi के लिए आवश्यक है कि वह सत्याग्रह के शस्त्र के प्रयोग सावधानी तथा बुद्धिमत्ता से करे। सत्याग्रह का प्रयोग (Gandhi JI use of satyagraha) उस समय किया जाना चाहिए, जब अन्य शांतपूर्ण तरीके असफल हो चुके हों।

Objective of Satyagraha (सत्याग्रह का उद्देश्य)

Satyagraha का उद्देश्य विरोधी को हराना या नीचा दिखाना नहीं, अपितु उनका हृदय परिवर्तन करके उसे अपने अनुकूल बनाना है। सत्याग्रह प्रारम्भ करने के लिए, विरोधी की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। क्या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में सत्याग्रह की अनुमति है? इसका उत्तर यह है कि प्राय: यह माना जाता है कि लोकतन्त्र में संसद जनता की प्रतिनिधि संस्था है तथा इसके निर्णय, जननिर्णय माने जाते हैं।

Gandhi जी हर शासन प्रणाली में सत्याग्रह के समर्थक थे। उनकी आस्था संसद द्वारा व्यक्त बहुसंख्यकों के निर्णयों की श्रेष्ठता में नहीं थी। उनकी समस्या तो सत्य पर आधारित नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करने की थी। यदि बहुसंख्यक यहाँ तक कि सौ में से निन्यानवे लोग भी असत्य का साथ दें तो गांधी जी अकेले ही सत्य बात कहने के समर्थक थे।

राष्ट्रीय आन्दोलन (National Movement) के समय में ऐसे अनेक अवसर आए. जब गांधी जी ने कहा कि यदि मैं अकेला रह गया, तो भी अनुचित कानून अथवा व्यवस्था का विरोध करूँगा। वस्तुतः संख्यामूलक बहुमत और सत्याग्रह (satyagraha) की नैतिकता दोनों में अनिवार्यतः कोई सम्बन्ध नहीं है। लोकतन्त्र कई बार तुच्छ विचारों एवं पार्टी के निहित स्वार्थों आदि से प्रभावित हो सकता है, पर सत्याग्रही के लिए इन सबका कोई अर्थ नहीं है।

उसे तो अपनी आत्मा के अनुसार कार्य करना चाहिए तथा यदि व्यवस्थापिका द्वारा स्वीकार किया गया कानून सत्य विरोधी है तो उसे उसका विरोध करना चाहिए फिर चाहे वह इस कार्य में अकेला ही क्यों न हो। Satyagraha, शाश्वत विचार का विरोध करता है।

सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध (Satyagraha and Passive Resistance)

गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में वहाँ की गोरी सरकार द्वारा भारतीयों के लिए बनाए-गए अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करने के लिए अहिंसात्मक प्रतिरोध करने का निश्चय-किया। गांधी जी ने प्रारम्भ किए गए आन्दोलन का नाम “निष्क्रिय प्रतिरोध” (पैसिव (रेजिस्टेन्ट) रखा।

यह नाम अंग्रेजी में प्रचलित शब्द के आधार पर रखा गया। उस समय इसका सामान्य अर्थ समझा जाता था कि अन्याय का विरोध, शास्त्रों द्वारा न किया जाकर, शान्तिपूर्ण रीति में किया जाए। इसमें अहिंसा का प्रयोग किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक विचार के कारण नहीं अपितु इस मजबूरी के कारण होना था कि कमजोर होने के कारण अथवा हथियार न होने के कारण हिंसा का प्रयोग किया नहीं जा सकता था।

इसमें हृदय से हिंस से कोई परहेज नहीं रहता था। सत्याग्रह इससे बिलकुल भिन्न है, उसमें अहिंसा के प्रति असीम एवं अटूट आस्था रहती है। अहिंसा Satyagraha की आधार शिला है। गांधी जी ने वाद में दोनों में अन्तर किया।

Different forms of Satyagraha (सत्याग्रह के विभिन्न रूप)

सत्याग्रह के दो रूप होते हैं, व्यक्तिगत एवं सामूहिक। व्यक्तिगत सत्याग्रह व्यक्ति द्वारा अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है तथा सामूहिक सत्याग्रह समाज के लोगों द्वारा सार्वजनिक प्रश्नों पर किया जाता है। दोनों प्रकार के सत्याग्रह के निम्नलिखित रूप हैं असहयोग आन्दोलन इस आन्दोलन में शासन या विरोधी से असहयोग करके उसकी शक्ति को कमजोर किया जाता है।

  1. अनशन-अनशन का उद्देश्य स्वयं की आत्मशुद्धि करना तथा अत्याचार और बुराई करने वाले व्यक्ति का हृदय परिवर्तन करना होता है। इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। अनशन द्वारा जनमत निर्मित होता है।
  2. हड़ताल किसी प्रश्न पर शासन तथा जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए हड़ताल की जाती है। हड़ताल, विरोधी के हृदय परिवर्तन के लिए होती है।
  3. बहिष्कार-यह सत्याग्रह का प्रबल शस्त्र है। इसमें विरोधी की वस्तुओं, उसके व्यापार आदि तथा उसके द्वारा उत्पादित चीजों का बहिष्कार किया जाता है। इससे विरोधी पर दबाव पड़ता है। –
  4. धरना-इसका उद्देश्य अनचाही वस्तुओं एवं कार्यों के प्रति जनता और शासन का ध्यान आकर्षित करना है।

Different forms of Satyagraha

  1. हिजरत-इसका अर्थ है, स्वेच्छा से स्थान छोड़ देना। Satyagraha में इसका अर्थ है, जिस स्थान पर दमन हो रहा है स्वेच्छा से उस स्थान को छोड़ देना तथा दूसरे स्थान पर जाकर आत्मसम्मान से रहने लगना। गांधी जी ने 1928 में बारदौली, लिम्बली, जूनागढ़ तथा विट्ठलगढ़ के निवासियों तथा 1935 में कविथा के हरिजनों को सवर्ण के दमन से मुक्त होने के लिए अपना स्थान छोड़ने की सलाह दी।
  2. सविनय अवज्ञा-सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह का प्रखर रूप है। इसमें कानून विशेष अथवा सम्पूर्ण शासन का विरोध किया जाता है। इसका उद्देश्य शासन के कानूनों को अहिंसक तरीके से न मानना है तथा इतना दबाव बढ़ाना है कि शासन ठप्प पड़ जाय।

निष्कर्ष:

Gandhi जी, स्वदेशी आक्रमण और युद्ध के विरुद्ध सत्याग्रह के समर्थक थे। सत्याग्रह स्वयं युद्ध के समान प्रभावकारी शस्त्र है। ES प्रकार से दोस्तों गांधी जी के द्वारा सत्याग्रह की शुरुआत (Gandhi On Satyagraha) हुई और सत्याग्रह के मुख्य उद्देश्यों के बारे में जाना । आपको यह जानकारी बहुत ही उपयोगी लगी होगी। आर्टिकल पढ़ने के लिए धन्यवाद और भी गांधीजी के बारे में पढ़ सकते हैं।

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