Gandhi Ji Ke Arthik Vichar एवं आदर्श अराजक समाज का विचार

गांधीजी के आर्थिक विचारों (Gandhi Ji Ke Arthik Vichar) के साथ-साथ आदर्श अराजक समाज की स्थापना का विचार, साथ में आदर्श समाज की व्यवहारिकता और संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था लोकतंत्र में निर्वाचन और Gandhi Ji Ke Arthik Vichar को इस आर्टिकल में आप पढ़ने वाले हैं तो चलिए शुरू करें।

Gandhi Ji Ke Arthik Vichar
Gandhi Ji Ke Arthik Vichar

आदर्श अराजक समाज की स्थापना का विचार

गांधी जी एक आदर्श अहिंसक समाज, राज्य विहीन लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे जो अपनी रचना में विकेन्द्रित समाज होगा। गांधी जी केन्द्रीकरण के विरोधी थे। उनका मानना था कि केन्द्रीकरण में शक्ति के दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है, अहिंसा का केन्द्रीकरण से कोई मेल नहीं है।

ऐसे समाज में व्यक्ति सामाजिक जीवन का स्वयं ही अपनी इच्छा से नियमन करेंगे। इसमें राष्ट्रीय जीवन इतना पूर्ण हो जाएगा कि समाज को व्यवस्थाओं के संचालन के लिए किसी प्रतिनिधि संस्था की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। यह स्थिति ज्ञानपूर्ण अराजक स्थिति होगी। इस स्थिति में प्रत्येक अपना स्वयं का शासक होगा तथा अन्य के लिए वह कभी भी बाधक नहीं बनेगा।

आदर्श अराजक समाज ऐसे व्यक्तियों के आत्मनिर्भर ग्रामीण समुदायों का संघ होगा जो सत्याग्रह के सिद्धान्तों का पालन करेंगे। यह समाज विकेन्द्रित होगा तथा इसका आधार स्वेच्छपूर्ण पारस्परिक सहयोग होगा। इस समाज में सभी व्यक्तियों के समान अधिकार होंगे। सभी को शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा। सम्पत्ति का अधिकार तो सबको होगा, पर कोई भी व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने योग्य सम्पत्ति से अधिक सम्पत्ति नहीं रखेगा।

Gandhi Ji Ke आदर्श अराजक समाज का विचार

जिस पर अधिक सम्पत्ति होगी, वह उसको अमानत के रूप में ही रख सकेगा। यह समाज शोषण रहित होगा। ऐसे समाज में बड़े कारखाने नहीं होंगे क्योंकि वे शोषण के आधार हैं। छोटे-छोटे कुटीर उद्योग एवं ग्रामोद्योग होंगे। भारत के लिए कुटीर उद्योगों और ग्रामोद्योगों का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इससे देश की बेकारी की समस्या का समाधान होगा।

आदर्श समाज में रेल, भारी मशीनें, न्यायालय, वकील और बड़े शहर नहीं होंगे। उनका मानना था कि समाज में यदि ये पाँचों चीजें नहीं रहेंगी तो समाज की कोई हानि नहीं होगी, अपितु इसका कल्याण ही होगा। पर गांधी जी यह अवश्य कहते थे कि स्वराज्य में ये पाँचों प्रकार की चीजें रहेंगी।

आदर्श समाज की व्यावहारिकता Gandhi Ji Ke Vichar

यह एक अहं प्रश्न है कि क्या गांधी जी के आदर्श समाज की स्थापना पृथ्वी पर सम्भव है? विज्ञान और तकनीकी प्रगति तथा भौतिकता की दौड़ ने इसकी व्यावहारिकता पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि गांधी जी ने प्लेटो के समान काल्पनिक तथा स्वप्नलोकीय विचारों को प्रस्तुत किया हो।

गांधी जी स्वयं जानते थे कि वर्तमान में ऐसे आदर्श समाज की स्थापना सम्भव नहीं है। उन्होंने 1946 में स्पष्टतः कहा था कि संसार में कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहाँ सरकार न हो, तथापि उनको विश्वास था कि यदि हम अहिंसक समाज के लिए सतत् प्रयत्न करते रहेंगे तो धीरे-धीरे समाज विकसित हो सकेगा जो राज्य विहीन हो।

यूक्लिड ने कहा है कि रेखा वही हो सकती है जिसमें चौडाई न हो, लेकिन ऐसी रेखा न तो आज तक कोई बना पाया है और न बना पाएगा। फिर भी आदर्श रेखा को ध्यान में रखने से ही प्रगति हो सकती है। जो बात रेखा के बारे में सच है वही प्रत्येक आदर्श के बारे में सच है। हाँ, उनका यह विश्वास अवश्य था कि यदि इस प्रकार के समाज की कहीं स्थापना होगी तो वह भारत में ही होगी।

संसदीय शासन (parliamentary rule)

गांधी जी संसदीय शासन के कटु आलोचक थे। उनका विश्वास पाश्चात्य लोकतंत्रात्मक प्रणाली में नहीं था। वे इस बात को जोर देकर कहते थे कि पश्चिम ने जिस लोकतंत्री प्रणाली को स्वीकार किया उसमें दिखावा अधिक है। ईमानदारी और जनकल्याण की भावना कम है। गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज्य’ नामक पुस्तक में ब्रिटिश पार्लियामेन्ट की तुलना बाँझ महिला और वैश्या से की है। उनका कहना था कि मैं उन्हें बाँझ इसलिए कहता हूँ कि अब तक उसने एक भी अच्छा काम अपने आप नहीं किया है।

उसके ऊपर दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे। वह (ब्रिटिश संसद) वैश्या इसलिए है कि जो मंत्रिमण्डल यह बनाती है, वह उसी के वश में रहती है। पार्लियामेन्ट के सदस्य ढोंगी और स्वार्थरत होते हैं। जिस समय बड़े-बड़े मामलों पर बहस होती है उस समय उसके सदस्य लम्बी तानते या बैठे-बैठे झपकियाँ लिया करते हैं। कभी-कभी वे इतना चीखते-चिल्लाते हैं कि सुनने वाले घबरा जाते हैं, ब्रिटेन के एक महान लेखक कॉर्लाइल ने पार्लियामेन्ट को दुनिया का बकवास खाना कहा है।

गांधी जी ने प्रधानमंत्री के नेतृत्व की भी आलोचना की है। उनका मत है कि प्रधानमंत्री को अपनी स्वयं की सत्ता की चिन्ता होती है। वह संसद की चिन्ता नहीं करता। गांधी जी मानते थे कि सिद्धान्तों की अपूर्णता के कारण ही लोकतंत्र में जनता अहिंसा का सहारा ले तो लोकतंत्र में से बहुत-सी कमियों को दूर किया जा सकता है।

Gandhi Ji Ke लोकतंत्र में निर्वाचन Vichar

लोकतंत्र में निर्वाचन का काफी महत्त्व है। गांधी जी निर्वाचन और प्रतिनिधि दोनों के समर्थक थे। पर वे दोनों के प्रचलित स्वरूप को बदलना चाहते थे। वे चाहते थे कि मतदाता ऐसे लोगों को बनाया जाना चाहिए जो शारीरिक श्रम द्वारा राज्य की सेवा करते हों तथा जिन्होंने मतदाता होने के लिए स्वयं अपना नाम दर्ज कराया हो। गांधी जी ने ग्राम पंचायतों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धान्त का समर्थन किया। सभी गाँव अपने जिले पर प्रशासन करने वालों को चुनेंगे पर इस पद्धति में एक गाँव का एक वोट होगा। जिला प्रशासन प्रान्तीय प्रशासन को और प्रान्तीय प्रशासन इसी प्रकार राष्ट्रपति को चुनेगा।

निर्वाचन में खड़े होने वाले प्रत्याशियों के लिए गांधी जी ने योग्यताएँ प्रस्तावित की हैं। प्रत्याशी वह बन सकता है जो स्वार्थरहित, पदलोलुपता से दूर, सदाचारवाला, भ्रष्टाचार से दूर, समाज सेवा की भावना से पूर्ण हो। उम्मीदवार को वोट उसकी सेवा के आधार पर मिलना चाहिए।

मतदाता की उम्र का भी विचार गांधी जी ने किया। वे 18 वर्ष के ऊपर के सभी मताधिकार देने के समर्थक थे। साथ ही अधिक वृद्ध लोगों को मताधिकार देने नहीं थे। 18 से 50 वर्ष के बीच जो शरीर श्रम कर सकें ऐसे व्यक्तियों को वयस्कों को के समर्थक मताधिकार दिया जाना चाहिए। गांधी जी इस मत के थे कि बहुमत को अल्पमत के प्रति उदार होना चाहिए और अल्पमत पर बहुमत का अत्याचार नहीं होना चाहिए।

Gandhi Ji Ke Arthik Vichar (गांधी जी के आर्थिक विचार)

गांधी जी ने आर्थिक नीतियों के सम्बन्ध में कोई निश्चित योजना या विधिवत विचार प्रस्तुत नहीं किए। उन्होंने समय-समय पर जो विचार प्रस्तुत किए हैं, उनमें आर्थिक चिन्तन प्रगट होता है। गांधी जी का आर्थिक चिन्तन अर्थशास्त्र को आध्यात्मिकता की ओर ले जाने वाला था।

उनके चिन्तन का लक्ष्य अन्यायपूर्ण असमानता को समाप्त कर शोषणरहित समाज की स्थापना करना था। इसके लिए उन्होंने ऐसी आर्थिक व्यवस्था का समर्थन किया, जो विलासिता और दिखावा का त्याग कर मनुष्य को सरल, शान्त और अहिंसक जीवन जीने के लिए प्रवृत्त करे।

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